रचना पुंज हिंदी । कबीर
____________पद्य भाग______________
इकाई-1
__कबीर__
भाग--क
प्रश्न- पाठ्यक्रम में निर्धारित कबीर के दोहों के आधार पर उनके काव्य का वर्ण्य विषय क्या है.
स्पष्ट कीजिए। उत्तर- हमारे पाठ्यक्रम में निर्धारित पन्द्रह दोहों में महात्मा कबीर के काव्य की अधिकांश 'विशेषताएँ सामने जाती हैं। कबौर निर्गुण मार्गी थे इसलिए अपने प्रभु के स्वरूप के विषय में कहते हैं भारी कहीं तो बहु कहीं तो झूठा' और इसका कारण बताते हैं 'नैनू कबहुँ न दीता' (दोहा संख्या-15) इस प्रकार ईश्वर को इंदि कह देते हैं। कबीर की कविता मौखिक परम्परा से आगे बढ़ी और वे निरक्षर थे इस बात को पहले दोहे में स्पष्ट क हुए कहते हैं 'मसि कागद छूयो नहिं कलम गहो नहि हात।'
कबीर के काव्य का एक पक्ष समाज सुधार है जिसमें धार्मिक आडंबरों और अन्ध-विश्वासों का विरोध प्रमुख रूप से किया गया है। दूसरे दोहे में कबीर सिर के बाल मुंडाकर साधु दीखने का विरोध करते हैं तथा तीसरे दोहे में वैष्ण भक्तों द्वारा शरीर पर धार्मिक चिह्न अंकित करने और संसार को ठगने का विरोध करते हैं।
कबीर मूलतः भक्त थे, समाज सुधारक नहीं इसलिए उनके काव्य में आत्मा-परमात्मा के मिलन की तीव्र इच्छा से युक्त दोहे भी हैं। चौथे दोहे में उनकी विरहिणी आत्मा अपने राम के मिलन को प्रतीक्षा करती है और उनके विरह में अपनी बेचैनी को प्रकट करती है। पाँचवें दोहे में विरहिणी आत्मा अपने प्रभु के पास पहुँचने अथवा उन्हें अपने प बुलाने में अपनी असमर्थता व्यक्त करती है। क्या उसके राम इस विरहिणी को ऐसे ही परीक्षा लेते रहेंगे और उसे दर्शन नहीं देंगे। भक्त अथवा साधु के लिए सदाचार ही एकमात्र कसौटी है। सारे सांसारिक बन्धनों को तोड़कर, सर्वत्र प्रभु की लाली देखने वाला ही सच्चा भक्त है ऐसा दोहा संख्या 9 और 10 से स्पष्ट है। महात्मा कबीर रामनाम के प्रति आंट प्रेम को ही सर्वोपरी मानते हैं। रामनाम का नशा कर लेने के पश्चात् भक्त को और किसी नशे को जरूरत नहीं रह दोहा संख्या 6 में यही स्पष्ट किया गया है।
कबीर के काव्य का मुख्य स्वर संसार की नश्वरता और मानव जीवन की क्षणभंगुरता है। वास्तव में यही दो तत्त्व मनुष्य को भक्ति की ओर ले जाते हैं। दोहा 7 में मृत्यु की अनिवार्यता, आठ में संसार की नश्वरता के साथ-साथ 12,
13 और 14 संख्या के दोहों में संसार की नश्वरता और ईश्वर की सर्वव्यापकता पर प्रकाश डाला गया है। काव्य-सौन्दर्य - महात्मा कबीर के काव्य में निर्गुण ब्रह्म का गुणगान, समाज सुधार की उत्कट इच्छा जिसमें
और अन्धविश्वासों का विरोध कर समता और न्याय पर आधारित समाज बनाने की इच्छा विशेष रूप में प्रकट हुई है। भक्त के रूप में कबीर भक्ति का आधार सदाचार को मानते हैं, शास्त्र ज्ञान अथवा आडम्बरों को नहीं भक्त कबीर ने प्रभु प्रेम का चित्रण करते हुए अपनी आत्मा की करुण पुकार को भी विरह के दोहों और पदों में दिया है। कबीर की कविता में सबसे सरस और मार्मिक अंश यही है।
कबीर की कविता में उदाहरण, उपमा, मानवीकरण तथा अनुप्रास अलंकारों का अधिक प्रयोग हुआ है। कबीर की भाष
में विभिन्न बोलियों का समावेश है इसलिए उनकी भाषा को सधुक्कड़ी कहा जा सकता है। कबीर का काव्य एक नये समाज
की संरचना को साकार करने के लिए लिखा गया जो न्याय और समता पर आधारित हो इसलिए आज भी प्रासंगिक है।
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